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कोटा दशहरा मेला

संस्कृति, परम्परा, विरासत

Kota Dussehra Mela
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✦ KOTA DUSSEHRA ✦

कोटा दशहरा मेला

माँ चम्बल के तीर पर सजा हाड़ौती की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत अधिष्ठान कोटा का ऐतिहासिक दशहरा मेला लोक-संस्कृति, आस्था और विजय का अद्वितीय महाकुंभ है। यह पर्व केवल अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक नहीं, अपितु भारतीय लोक-कला, शिल्पकला और पारंपरिक उल्लास का वह पावन संगम है, जहाँ इतिहास और आधुनिकता एक साथ सांस लेते हैं। विशालकाय रावण दहन की यह परम्परा हमारी समृद्ध विरासत का गौरवशाली हस्ताक्षर है। लोक कलाओं और उत्सवों से सजी यह माटी आज भी अपनी प्राचीन परंपराओं को सहेजते हुए हर हृदय में उल्लास का नया दीप प्रज्वलित करती है।

Heritage & History
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✦ KOTA DUSSEHRA ✦

विरासत एवं इतिहास

कोटा में दशहरा के अवसर पर धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन महाराव दुर्जनशाल सिंह जी (1723-1756) के कार्यकाल से होने लगा था। दशहरे मेले को एक व्यवस्थित रूप देने की परंपरा महाराव उम्मेद सिंह जी द्वितीय (1889-1940) ने 1892-93 में प्रारंभ की थी। उस दौरान तीन दिवसीय मेले का आयोजन होता था, जिसमें रावण वध के दिन अधिक चहल-पहल रहती थी और तिरपालों में छोटी-छोटी दुकानें लगाई जाती थीं। समय के साथ मेले की अवधि बढ़कर सात दिन हो गई और व्यापारियों की संख्या भी बढ़ने लगी। वर्ष 1921 में नगर पालिका की स्थापना के बाद मेले के आयोजन का दायित्व पालिका को सौंप दिया गया, जिसके बाद देश के अन्य राज्यों के व्यापारियों को भी मेले में आमंत्रित किया जाने लगा।

Darikhana – A Symbol of Royal Grandeur
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राजसी वैभव का प्रतीक दरीखाना

कोटा दशहरा मेले का एक अत्यंत विशिष्ट और आकर्षक कार्यक्रम दरीखाना है, जिसका गरिमामय आयोजन गढ़ पैलेस में किया जाता है। पूर्व महाराव इज्यराज सिंह जी की मेजबानी में राजसी वैभव और शाही वातावरण से सजे इस आयोजन में परम्परागत वेशभूषा और राजस्थान की आन-बान और शान के प्रतीक ‘साफे’ इस कार्यक्रम की शोभा को समृद्ध प्रदान करते हैं। पूर्व ठिकानेदार और राजपूत सरदारों के साथ गणमान्य नागरिक और प्रबुद्धजन भी दरीखाने में सम्मिलित होते हैं, जो इसकी गरिमा को और अधिक भव्यता प्रदान करते हैं। दरीखाना केवल मात्र एक सामाजिक आयोजन नहीं, अपितु यह हमारे गौरवशाली अतीत और स्वर्णिम वर्तमान के मध्य एक सेतु की भूमिका का निर्वहन करता है।